तू कृष्ण बन – Delhi Poetry Slam

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तू कृष्ण बन

By Jagat Singh

कठिन है संघर्ष देख ले
आएंगी चुनौतियाँ देख ले
देख ले बीज से पेड़ बनने का सफ़र
रखनी होगी हिम्मत और सबर

यह जीवन कोई खेल नहीं
नहीं शतरंज का प्यादा है
यहाँ डर, भय इन सबसे ऊपर मर्यादा है

यहाँ अभिमान अपना, शान अपनी, संस्कार अपने...
भय का कोई नाम नहीं...
इन जलती ईंट की भट्टियों में मोम का कोई काम नहीं...

अगर है लोहा तो आ जा इस रण में
धरती की छाती को चीर कर...
इन पहाड़ों के पत्थर को नीर कर...
जो सिर उठे तेरी बगावत में उसे रख दे तरकश के तीर पर...

इन आँखों की जलती ज्वाला में...
श्मशान बना दे दुश्मन का...
इस तपते तन की गर्मी से...
भय बढ़ा दे हर मन का...
ये जो सिर पर चढ़े बैठे हैं...
काम करेंगे कठपुतली से
देखने को छवि ऐसी...
भाव बढ़ेगा दर्पण का...

सब कुछ है पास में तेरे...
मुट्ठी खोल के देख तो सही...
ये लकीरें तेरी तलवार बनेंगी...
अगला पासा फेंक तो सही...
पाँसे से बाज़ी पलटेगी
यहाँ हर कोई शकुनी चौसर का...
फिर बाज़ी पर नारी होगी...
फिर आगाज़ होगा जौहर का

तू यह द्रढ़निश्चय कर, साँसों में लपटें भर...
जौहर फिर से जलने न दे...
हर नारी का चीर बन...तू कृष्ण बन

जिस महफ़िल में मर्यादा मर्दांगी ना हो...
उसकी तरफ़ ढूंक मत
जिसके हाथ बढ़ें अधर्म को...
उसकी उतार ले गर्दन, चूक मत

भरी महफ़िल में लुटे इज़्ज़त...
बलशाली, धनुर्धारी, ज्ञानी, धर्म रक्षक...
फिर तो ये सारे गुण भी व्यर्थ...
अधर्म में बाँधे जो वचन...
फिर उनका क्या ही अर्थ...
तू तोड़ दे सारे ऐसे बंधन...
तू नारी के नयननीर का तीर बन...
तू करुण बन... तू कृष्ण बन

क्या फ़ायदा उस तीर का जो...
मौन हो बचाने औरत के मान को
क्या रखा है ऐसे बल में...
जो फँसा दे औरत को क्षल में..
क्या करोगे उस ज्ञान का...
जिसे समझ न हो सम्मान का...

भला ऐसा कौन धर्मी हुआ...
जो इज़्ज़त को लगा दे दाँव पर
ऐसी भी क्या मजबूरी जो हथकड़ी लगा दे बाहों पर

तू छाती चीर कर लहू पी...
जो षड्यंत्र में शामिल सारे थे
तू आँखें नोच के फोड़ दे...
जो नज़र अपनी उठा रहे थे...

हर क्षण का तू हिसाब ले...
हर क्षण का तू प्रहार कर...
हर प्रहार का तू पीर बन...
तू वीर बन...तू कृष्ण बन

हुंकार भर... रण में लड़...
पापी का कर धड़ अलग...
बढ़ाता जा धर्म को...
अधर्म की रेखा संकीर्ण कर...
पाप की शक्ति क्षीण कर...

तू अकेला चल... न भीड़ बन
वचनों में बंधकर, न स्वीकार अधर्म
युद्ध न लड़ पाए तो... हार मत
तू सारथी बन...तू कृष्ण बन

तू रक्तपात कर, रणभूमि लाल कर
यह खेल मृत्यु का, न क्षण भर मलाल कर..
ऐतिहासिक हो ये पल तेरा,
धरती का रंग अमर लाल कर


नीति नित्य ही नियमित रहे...
अशांति सदा ही सीमित रहे...
मन पर नियंत्रण निश्चित हो...
असहाय का तू ढाल बन...
.....तू कृष्ण बन!


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