यादों के मोती – Delhi Poetry Slam

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यादों के मोती

By Ishika Ranjan

यादों की वो लहरें
दे गईं दस्तक
दिल के दरवाज़े पर
आहिस्ता आहिस्ता आहिस्ता

कल जब स्पर्श हुआ
स्कूल की दहलीज़ पर खड़े
हरे फाटक का
गुज़र चुके थे दो साल
ऊँची उठती यादों की लहरों में
झूमने लगी मैं
धीरे- धीरे धीरे- धीरे

यादों के मोतियों से 
पिरोयी हुई माला थामे
झांक रही थी मैं
बंद दरवाज़े के भीतर
अँखियाँ देख रहीं थीं
टुकुर टुकुर टुकुर टुकुर

तभी आए नीली वर्दी में 
गार्ड अंकल
पहचान ना पाए
मास्क के पीछे छिपे चेहरे को
कहने लगे
टीचर वहाँ मिलेंगी
चुप -चाप मैं चल दी आगे
इधर -उधर
आगे -पीछे
नीचे- नीचे
नज़रें तलाश रहीं थीं कुछ और

आज एक वीरान ख़ामोश अरण्य जैसा
लग रहा था यह विद्या का मंदिर
मेरे जिगर का टुकड़ा
10 साल तक जहाँ
हँसी- ख़ुशी से
पढ़ना लिखना सीखा मैंने
यादों का हमसफ़र वो मेरा

अचानक हँसी के फ़व्वारों की आवाजें
लगी गूंजने मेरे कानों में
खेल -मैदान में दौड़ते सहपाठी
दिखने लगे
सपनों की दुनिया में
खो गई मैं इक पल उन्हीं में
गुज़री यादों की घंटी
बजने लगी
ट्रिंग ट्रिंग ट्रिंग

टीचर से क्षण भर की भेंट
हक़ीक़त थी
लगा जैसे कल ही मिली हूँ मैं उनसे
वही अपनापन, वही हौंसला अफ़ज़ाई
जो बन गई है
मेरे आज की पहचान

तृप्त मन से
अलविदा लेते हुए
बाहर जाते-जाते
फिर से नज़रें दौड़ाते- दौड़ाते
ढूँढ रही थी मैं उसे
जो दिखी नहीं थी अब तक

वो है हमारी लैला
हमारे स्कूल की लाडली
सब छात्रों की प्यारी
चार पैरों वाली दुलारी लैला
सुना है
अब उम्र के तक़ाज़े से
सुस्त व निष्क्रिय
हो चली है

तुमसे मिलने की चाह
पीठ थपथपाने की मनसा
अभी बाक़ी है मेरी दोस्त
अभी बाक़ी है मेरी दोस्त ।


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