खिड़की – Delhi Poetry Slam

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खिड़की

By Harshal Tidake

कितने क़िस्से .. कितने लतीफ़े ...
कितने सारे अफ़साने ..
कितने सारे मनकी गलियोंसे ..
गुज़री मेरी निगाहें
धुपकी लहर .. सावनकी बूँदें
आँसुओंकी लाडियाँ ... मुस्कानोंकी छीटें

सब निहारते किनारेपे
चुपचाप खड़ी हूँ मैं
हा .. खिड़की हूँ मैं

गोदिमे सवेर आँख खोले है
कंधोंपे मेरे चाँदनी खेले है
चौकटपे दिये मनाए दीवाली
मौजसे चहले ठंडी पुरवाई
जल जल भिगोये सावन बैरी
अंग अंग जलाये धूप सुनहरी

हर रुत.. हर पहर घर पहुचाए
डाकिया दीवार मे खड़ी हू मैं

हा .. खिड़की हूँ मैं

रोकटोक ...गालिगलोच
हसी मज़ाक .. नोकझोक
चलते है .. चलते रहेंगे
मेरे रास्ते बहते रहेंगे

सबसे पहले घरतक पहुँचे
वो नज़रोंकि गली हूँ मैं
हा .. खिड़की हू मैं

मैं खुली तो आज़ादसी साँसे
मैं बंद तो असिरसी घुटन
रुकावटसी मेरी सलाखें
कभी थामे अकेलापन
दशा भी मैं दिशा भी मैं
खुदसे बाहर निकालकर देखो तो आईना भी मैं

बेबाक उड़ना चाहे उस मन की
परछाई हूँ मैं ..

हा .. खिड़की हूँ मैं !


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