ज़्यादा मीठा नुक्सान देता है! – Delhi Poetry Slam

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ज़्यादा मीठा नुक्सान देता है!

By Geetanjali Gupta

ज़्यादा मीठा नुक्सान देता है

चाहे सेहत हो या फिर रिश्ते

मात्रा सिमित ही रखना , वरना बीमारियों का सामान देता है

मीठा बड़ा नुक्सान देता है



पहले ज़बान को इसकी तलब लगती है

ख़ुमारी ज़ेहन पर बड़ी अलग लगती है

फिर वो इमरती हो या जलेबी या फिर अजब मंसूबे रखने वाला इंसान

मुझ जैसा एहमक फिर उसको अपनी ज़िन्दगी की कमान देता है

कहाँ न मैंने मीठा बड़ा नुक्सान देता है



सुन , फिर तलब आदत में बदलती है

फिर रोज़ दीदार की तमन्ना दिल में उछलती है

ज़रा ज़रा करते करते बात बढ़ती जाती है

और फिर, दिल मेरा रोज़ उसे मिलने की ज़बान देता है

उफ़, इस से मोहब्बत न कर

मीठा बड़ा नुक्सान देता है



होता है फिर सिलसिला शुरू घर में दाखिल होने का

मिलता है सुबूत मुझे मेरे जाहिल होने का

जिस्म हो या फिर आशियाना तेरा

रोग बढ़ता है , और फिर बंदा अपनी जान देता है

कहा था न मैंने मीठा बड़ा नुक्सान देता है



क्यों सीखने के लिए मरना ज़रूरी है ?

न भाग रोज़ पीछे इसके , यह कस्तूरी है

बात को समझा कर ऐ दोस्त

ज़माना हो या मिठाई , इरादे ग़लत है इसके

क्यों ग़लत शह को अपना ईमान देता है

बड़ा ज़ालिम है यह , बड़ा नुक्सान देता है

दूर हो जा इससे , क्यों मेरी बात नहीं मान लेता है

मीठा बड़ा नुक्सान देता है

मीठा बड़ा नुक्सान देता है!


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