ईमानदारी – Delhi Poetry Slam

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ईमानदारी

By Gaurav Bhatnagar

ईमानदारी कठघरे में है, सवाल पूछ रहे हैं लोग
ईमानदारी कठघरे में है, सवाल पूछ रहे हैं लोग

टेढ़ी निगाहें, तीखे व्यंग्य, उबलता शोर…
तय करेगा तुम निर्दोष हो या हो चोर

ईमानदारी की परिभाषा बदल गई, आप नहीं जानते जनाब?
ईमान अब वो नहीं जो ख़ुद्दारी दर्शाये…
ईमान अब वो नहीं जो ख़ुद्दारी दर्शाये…
ईमान अब वो जो बस मेरा भद्दापन छुपाए

तुम उतारोगे मेरे कपड़े तो मैं चुप रहूँगा क्या….
तुम उतारोगे मेरे कपड़े तो मैं चुप रहूँगा क्या…
ईमान का तुम्हारा चोग़ा नोंच नहीं डालूँगा भला?

भद्दा मैं अकेला नहीं, ये समाज है भद्दा
भद्दा मैं अकेला नहीं, ये समाज है भद्दा
ईमानदारी का ये कपड़ा नहीं है यहाँ जँचता

फाड़ो इसे देखें तुम्हारा असली रूप…
इस कीचड़ से कैसे बचे हो तुम,
धँसों इसमें और जाओ डूब

ईमानदारी कठघरे में है, सवाल पूछ रहे हैं लोग
दलील क्या देनी, जिरह क्या करनी, गवाह क्या सुनने
९ बजे चिल्ला चिल्ला के बतायेंगे क्या गुनाह किए तुमने

आईने पसंद नहीं हमें…हर हाथ में पत्थर दे दिया है
आईने पसंद नहीं हमें…हर हाथ में पत्थर दे दिया है
ईमान को तुम्हारे चकनाचूर करने का तय किया है

ईमानदारी कठघरे में है, सवाल पूछ रहे हैं लोग
मुड़ के देखो दोस्त, ये दुनिया ईमान से परे है अब
कठघरे में ईमान नहीं, ज़मीर रो रहा है अब…

ख़ुद को मिले धोके से अवाक है ईमान
ख़ुद को मिले धोके से अवाक है ईमान...
स्तब्ध है देख बोलबाला उसका जो है बेईमान

मार लो पत्थर मुझे…मार लो पत्थर मुझे…
मर तो मैं गया था मुन्नी को बेचा था जब,
पड़ोसी को जलाया था जब,
माँ को घर से निकाला था जब,
राम के नाम पे लोगों को मारा था जब…

लो चला मैं मुबारक हो तुम्हें ये रोग
मैं ढूँडूँगा एक कोना जहाँ कर पाऊँ इंसानियत पर सोग


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