कर्म रहेगा – Delhi Poetry Slam

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कर्म रहेगा

By Dr Surabhi Singh

आओ सारथी का फ़र्ज़ निभाता हूं,
बस बैठने मात्र से हस्तिनापुर दिलाता हूं।
सुनो दुर्योधन, दो विकल्प बतलाता हूं,
बस चयन मात्र से विजय या पराजय दिखलाता हूं।

नारायण या नारायणी सेना, पहला अवसर तुझे देता हूं,
महायुद्ध के महासंग्राम की कथा तुझे समझाता हूं।
धृतराष्ट्र का पुत्र अभी दूर का देख न सका,
जो ब्रह्माण्ड रोक सके, वो माधव ले न सका।

चला क्षितिज, जल, पावक, गगन, समीर को साधने,
जिसमें बसा यह पांच तत्व, वो माधव बांधने।

मैं त्रेता का राम नहीं,
द्वापर का कृष्ण हूं।
मैं मर्यादा पुरुषोत्तम नहीं,
मैं मर्यादा में रखने वाला हूं।

इस महाभारत के महायुद्ध की रचना मैंने की है,
तेरे पापों की सज़ा भी मैंने तय की है।
तू कर्ण, भीष्म, अश्वत्थामा लाया है,
यह पांडवों ने मुझे पाया है,
एक क्षण में तीनों लोक रोक सके, तूने उसे ठुकराया है।

इतने तक बोले—धृतराष्ट्र: सही प्रभु, इसके सोच पे पहरा है,
मैं करता हूं क्षमा याचना, यह पुत्र मेरा है।

कृष्ण: क्या धृतराष्ट्र, अब बोल पाए तुम जब हो रहा चीरहरण,
वो कैसे सह पाए तुम?
अब जो तुमने बोला है, तुम भी यथार्थ सुनो—
यह जो पक्षपात का डंका पीटा है,
नेत्रहीन होने से सबको कटघरे में खींचा है।
क्या सही-गलत को देखा तुमने?
क्या पौत्रवधू और पुत्र को एक तराजू पर तोला तुमने?
क्या राज्यधर्म निभाया तुमने या नियति कहके सब कुछ टाला तुमने?

अब संजय तुझे महासंग्राम सुनाएगा,
क्योंकि कुल का नाश तू देख नहीं पाएगा।
यह बात कलयुग तक याद रहेगी,
उस मिट्टी का रंग भी लाल रहेगा,
इस घटना का साक्षी पूरा संसार रहेगा।

परंतु नारी का सम्मान रहेगा...
यह बताने राम का कोई रूप रहेगा...

चलो, इस सभा को यह मेरा अंतिम प्रणाम है,
कुरुक्षेत्र में फिर मुलाकात है।

राधे राधे...


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