मैं ज़िंदगी में ज़िंदगी ढूँढ रहा था – Delhi Poetry Slam

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मैं ज़िंदगी में ज़िंदगी ढूँढ रहा था

By Divyanshu Raj Pandey

मैं ज़िंदगी में ज़िंदगी ढूँढ रहा था
दफ़्तर के हर काम में,
बिस्तर पर आराम में,
ईंटों के मकान में,
और उसमें सजे सामान में —
मैं ज़िंदगी में ज़िंदगी ढूँढ रहा था।

गीता में, क़ुरान में,
खेल के मैदान में,
घर के दीवान में,
और बचपन के सामान में —
मैं ज़िंदगी में ज़िंदगी ढूँढ रहा था।

भीड़ में, वीरान में,
चाय की दुकान में,
जीत के सम्मान में,
और हर छोटे मुक़ाम में —
मैं ज़िंदगी में ज़िंदगी ढूँढ रहा था।

खुशबू भरे पैग़ाम में,
फूलों के बाग़ान में,
ढलती हुई उस शाम में,
और शाम के उस जाम में —
मैं ज़िंदगी में ज़िंदगी ढूँढ रहा था।

हुआ बहुत नाकाम मैं,
पर आया समझ कल शाम में,
कि ज़िंदगी है...

मेहनत में, आराम में,
लोगों में, सुनसान में,
गली की उस दुकान में,
दुकान से लगे श्मशान में।
है नीर में, मुस्कान में,
अपमान में, अभिमान में।
है ढूँढता बाहर कहाँ तू —
है ज़िंदगी इंसान में।।


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