कल्कि – Delhi Poetry Slam

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कल्कि

By Divyanshi Gaur

कलयुग की काली करतूतों का मैं विवरण करने आया हूँ।
मैं वो हूँ जिसने तुझे बनाया, अब अफसोस जताने आया हूँ।
वर्षों तक आँखें मूंदे मैंने, जिन कपट को पलते देखा है,
मैं वो हूँ जो कपटी लोगों को पाठ पढ़ाने आया हूँ।।

ज़हर में लिपटे शब्दों से तूने जो सबको घात किया।
उन शब्दों की ज़ंजीर बनाकर गला घोटने आया हूँ।
नारी को माँ का दर्जा दे फिर गाली जो तुम बरसाते हो,
अपनी तलवार की धार लिए उस जिह्वा को लेने आया हूँ।।

झूठ फरेब का मुखौटा पहन जो सत्य कुचलना चाहते हैं।
उस दुष्टता का अंधकार मिटाने, असत्य के संहार को आया हूँ।
मासूम की रूह जलाकर, तू जो देख तमाशा हँसता है,
मैं वो हूँ जो इन लोगों का अहंकार जलाने आया हूँ।।

विकराल रूप धर काल हूँ मैं, यूँ तो कल्कि कहलाता हूँ।
मैं धूर्त, कपट, छल, झूठों का परिणाम सुनाने आया हूँ।
इन क्रूर मनुज से भरे जगत में विध्वंस मचाने आया हूँ।
मैं पाप मिटाने आया हूँ, मैं कलयुग बदलने आया हूँ।।


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