मासूम इश्क – Delhi Poetry Slam

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मासूम इश्क

By Chanchal Malhotra

कल भरपूर प्यार था तुम्हें मुझसे, मगर मेरा कोई बहाना न था,
मोहब्बत को महसूस करूं, मेरी मासूम उम्र का तराना न था।

मेरे मुड़कर पूछने से पहले ही, तुम्हारा बिना कहे चले जाना,
मैंने समझा कि तुम्हारा मेरे संग चलने का कोई इरादा न था।

बरसों यादों में मैंने संभाला उन ख़ूबसूरत लम्हों को बिन कहे,
सदा महसूस किया तुम्हारी साँसों और धड़कन को बिन सहे।

मगर वक़्त तो दरिया है, जो अपनी ही धुन में बस बहता है,
सबकी ज़िंदगियों में दुःख-सुख भरता और मदमस्त रहता है।

बरसों बाद की तुमसे मुलाकात, मेरे ख्याल में कुछ ऐसी थी-
कि तुम चले तो थे, मगर तुम्हारी याद में मैं बिल्कुल वैसी थी।
आज भी मैं "प्यार" ही हूँ, और न मेरी मोहब्बत कभी बासी है,
मेरी रूह, मेरे मन की, न कल और न आज, पिंजरे की दासी है।

मुझे तुमसे आज भी इश्क़ है और उसमें मासूम पाकीज़गी है,
तुम उसे बिन वादे के गले लगा पाओ, ये तुम्हारी संजीदगी है।

मेरा तुमसे न कल था, न ही आज कोई लिखित वादा है,
कल मिलेंगे या नहीं, ऐसा सोचने का भी न इरादा है।

आओ, तुम भी मेरी निस्वार्थ लम्हों में थोड़ा संग चल लो,
न जाने कौन सा लम्हा आख़िरी हो, आज में ही रंग भर लो।
आज जो तुम्हारे पहलू में है, उसे प्यार से भरपूर कर लो,
जो इस पल की ख़ुशबू है, उसी में जीवन को मशगूल कर लो।

अपने लफ़्ज़ों से मेरी पाकीज़गी को ज़रा भी न धूमिल करो,
मैं कल भी थी और आज भी हूँ, तुम्हारे और इस जहाँ के लिए।
मगर छूने की उम्मीद और कोशिश में न उसे मलिन करो।
वक़्त के दरिया को यूँ ही ख़ूबसूरत लय में बहने दो,
उसकी लय में बसी हर बात बस उसी ख़ुमारी में रहने दो।


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