एक अनोखी गुफ़्तगू – Delhi Poetry Slam

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एक अनोखी गुफ़्तगू

By Chaiti Aranke

"कबीरा, जब हम पैदा हुए, जग हँसे, हम रोए,
 ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे, जग रोए..."

बचपन बीता यह दोहा सुनकर, बड़े बने पर एक डर था भीतर,
ऐसी कैसी यह दुनिया डरावनी, जिंदगी है या कोई रहस्यमयी कहानी!
पढ़ाई की दिक्कतें कैसे दूर करें! सबका चलन सरल नहीं होता, कैसे समझें?
माता-पिता सदा देते रहे सहारा, कब दे पाएँगे उन्हें अपने कंधों का किनारा?

काफ़ियों से सुनते, हम भगवान में भरोसा नहीं रखते, 
आत्मविश्वास के बल पर ही सफ़लता हासिल करते,
पर जब-जब मन टकराता किसी मुश्किल से, 
सोचता, कैसे निकलें इस जड़ता और दुख के अंधेरे से?

तब-तब एहसास होता, कोई आँचल तनकर है बैठा, 
फिर मन को लगता, अब कौनसा संकट? कौनसी निराशा? 
वक़्त गुज़रा वैसे समझा, मन की बड़ी लेन-देन है उस शक्ति से, 
विपत्तियाँ यूँ टल जाती हैं उसकी भक्ति करने से!

पहले मन कहता था, “ये कौनसी कठिनाई आ गई!”
अब कहने लगा, “कुछ ना करने से कोई उपाय सोचना ही सही!”
जिंदगी में लोग और समस्याएँ, हम आते-जाते पाएँगे, 
खुले दिमाग से सोचोगे, तो कोई तत्वज्ञान ज़रूर सिखा जाएँगे।

प्रयत्नों का परिणाम हो अच्छा या बुरा, पर तुम हो एक सिपाही,
हौसला रखकर ही समृद्ध होगी तुम्हारी अनुभवों की पिटारी!
चेतना और शांति हैं मनुष्य के सबसे कीमती गेहने,
अच्छा लगता है उतारकर, वो नकाब जो थे बरसों से पहने!

अणु से लेकर ब्रह्माण्ड तक, कहाँ-कहाँ ढूँढा तुम्हें!
एक जन्म लगा यह समझने, कि तुम उम्र-भर मौजूद थे इन्हीं आँखों में!
ख़ुद के साथ ख़ुश रहना, भले अंत में कोई साथ दे, ना दे,
आईने में देखकर उस शक्ति से कहना, तुम्हारी कृपा से जीवन की कसौटी जीत गए!

तुम्हारी एक पुकार, मन ख़ुशी-ख़ुशी त्याग देगा यह काया,
गर्जना कर- "इस दुनिया पर चिरकाल रहे, तुम्हारा यह अनमोल साया!"


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