तुम ज़िंदगी कुछ यूँ जीना – Delhi Poetry Slam

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तुम ज़िंदगी कुछ यूँ जीना

By Chahat Sharma

तुम ज़िंदगी कुछ यूँ जीना कि जब अंधेरे से भरा वक़्त दिखे,
तो उजाले-सा तेज़ अपना आत्मविश्वास बना लेना।

तुम ज़िंदगी कुछ यूँ जीना कि जब अकेलेपन से नींद न आए,
तो ख़ुद ही अपना सर सहला लेना।

फूल कहे अगर कोई, तो सिर्फ़ ख़ुशबू ही बनना,
क्योंकि क़ुदरत कभी क़ैद नहीं होती।

जान हथेली रख चलती चली जाना,
ज्वाला अपने अंदर की - बोली मत लगवाना।

तुम ज़िंदगी कुछ यूँ जीना कि कोई हँसे तुम पर,
तो तुम भी मुस्कुरा देना,
मुस्कुरा देना ये सोच कर कि रब्ब-ए-इनायत सबको नहीं मिलती।

तू बोझ नहीं, न थी कभी अबला,
मान लिया था ये तूने, तब से सब बदला।

लौट आ, बिखर रहा है सब,
दिखा दे, तुझसे ही है ये जग।

तुम ज़िंदगी कुछ यूँ जीना कि नाराज़ हो अगर क़िस्मत,
तो समय का हाथ थाम लेना।

ऐतबार करना ख़ुद पर आईना देखकर,
तब तक, जब तक ख़ुद से दीदार न हो रूहानियत।


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