खूबसूरत हो – Delhi Poetry Slam

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खूबसूरत हो

By Bhumika Kaushik

खूबसूरत हो,

 आयने की नज़रों से जब खुद को देखा तो

 आयना बोल उठा-खूबसूरत हो

 

 मैं थोड़ा शर्मायी

 आयने से नज़र मिला पायी

 

 आईने ने फिर कहा की तुम खूबसूरत हो

 मैं समझ पायी इन शब्दों को

 कुछ ख़ुशी हुई कुछ घबराई

 मैं घरबराते हुए बोली-

 मैं खुद में खामी रखती हूँ

 मैं खुद को खूबसूरत समझती हूँ

 आयना हैरान हुआ हस्ते हुए मुझको बोला-

 

 गुलाब को देखा है कभी, कितना खूबसूरत है

 क्या कभी किसीने उसके काँटों को पसंद किया है?

 पर क्या इस कारण गुलाब ने महकना बंद किया है?

 गुलाब सबका चहीता है

 प्यार जताने का इस जग में

 वो सबसे प्यारा तरीका है।

 

 चलो चाँद की सैर करादूं अब

 उसमे समाये दागों से मिलवादू अब

 दागों की वजह से चाँद अपनी खूबसूरती नहीं छोड़ता

 या यूं कहदूँ-चाँद दागों में समाकर भी खुद को नहीं भूलता

 इसीलिए हर आशिक अपनी प्रेमिका को चाँद बुलाता है

 क्योकि इश्क़ में दाग भी चाँद की खूबसूरती नहीं भूलता।

 

 अब कोयल से रूबरू करादूं,

 कितना सुन्दर वो जाती है, सुरीले तार लगाती है

 उसकी मधुर आवाज सबके मन को लुभाती है

 पर क्या किसी को कोयल का रंग कभी भाया है?

 मगर गाये मधुर गीत कोई,तो कोयल की याद दिलाती है,

 वो नारी कुछ और नहीं, कोयल कहलायी जाती है।

 

 अगला उदाहरण देता हूँ,इंसान के पक्ष में कहता हूँ (आईना कहता है)

 हर इंसान की अपनी ही कोई कोई खामी है

 नफरत ना पालो इन खामियों से ये तुम्हारी ही निशानी हैं

 जान लो-

 इंसान अपनी खामियों से नहीं, गुणों से जाना जाता है

 सच कहूं तो वो अपने विश्वास से जाना जाता है।

 

 तो क्यों ये ख़यालात रखती हो,

 खुद ही खुद में तड़पती हो

 अब मान लो की तुम खूबसूरत हो

 अगर मुझको अपना समझती हो

 और जब लगे खामियां हैं तुम में ,

 तो मुझसे आके मिल लेना

 नज़रों से नज़रें मिलाकर के ,

 मुझे आँखों से ही पढ़लेना

 क्योकि में आइना हूँ

 हकीकत बताता हूँ

 तुम्हे तुमसे रूबरू करता हूँ

 में आइना हूँ

 कभी झूठ नहीं बोलता हूँ।

कभी झूठ नहीं बोलता हूँ।


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