पिताजी (मुक्तछंद) – Delhi Poetry Slam

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पिताजी (मुक्तछंद)

By Babulal Sankhla Saini Babu

मैनें बन पिता पहचाना
पिता के दर्द को।
अब तक दूजा कोई मिला नहीं,
जो पिता सा हमदर्द हो।

डांटते थे, कभी मारते थे,
पर शाम को खाना साथ खिलाते थे।
ज़िद्द करता था टाल जाते थे,
फिर बाजार से वही खिलौना दिलाते थे।
साये की तरह साथ थे,
चाहे मौसम गर्म हो या सर्द हो।
अब तक दूजा कोई मिला नहीं,
जो पिता सा हमदर्द हो।

मैं नये जमाने का, सोचता था..
पिताजी कुछ नहीं जानते।
बहुत गुस्सा आता था जब ,
पिताजी मेरा कहना नहीं मानते।
हर चीज यूँ मांगता जैसे
मेरा अधिकार उनका फर्ज हो।
अब तक दूजा कोई मिला नहीं,
जो पिता सा हमदर्द हो।

उनकी हेसियीत से ज्यादा 
अक्सर मैं मांग लेता था।
अब सोचता हूं मैं उन्हें,
कितना अनचाहा दर्द देता था।
पिताजी मेरी इच्छापूर्ति में जब भी,
असमर्थ होते थे।
मैं खुले में आंसू बहाता था,
पिताजी छुप कर रोते थे।

कभी जो मैं चाहता, 
पिताजी दे नहीं पाते थे।
गुस्सा और चिंता झलकती
माथे पर, कारण नहीं बताते थे।
चेहरा यूं लगता, 
जैसे अंदर कोई दर्द हो।
अब तक दूजा कोई मिला नहीं,
जो पिता सा हमदर्द हो।

मैं अपने बच्चों पर गुस्सा नहीं करता,
जानता हुँ उनमें मैं हूँ।
पिताजी मुझमें है और 
मैं बच्चों में हुँ।
बच्चे समझते है खुदगर्ज मुझे,
पर कोई पिता नहीं जो खुदगर्ज हो।
अब तक दूजा कोई मिला नहीं,
जो पिता सा हमदर्द हो।


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