अब हो ही जाए! – Delhi Poetry Slam

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अब हो ही जाए!

By Avaninder Kumar

यादों की गुल्लक की धीमी सी खन खन,
बचपन की पायल की मीठी सी छन छन,
गोबर से लीपा वो गीला सा आंगन,
वो पहली फुहारी में भीगा सा सावन,
शहरों की रौनक है जब जब डराए,
वो गांव की ड्योढ़ी बड़ी याद आए,
वो पीपल के नीचे की सुस्त दोपहरी,
कहां खो गई कोई तो ढूंढ लाए,
जहां कहता था हुक्के का बेफिक्र धुआं;
जो भी है होना,वो अब हो ही जाए।

चूल्हे की लकड़ी की मद्धम सी धूं धूं,
अम्मा के चौंके की सौंधी सी खुशबू,
वो तारों की चादर के नीचे की शय्या,
गोधूली की टन टन में लौटती वो गैया,
खट्टे आंवलों ने मीठे सबक थे सिखाए,
भूल कर भी ना दिन वो कभी भूल पाए,
आसमानी लिफाफों में स्याही के धब्बे,
काश फिर से खत पुराने कोई पढ़कर सुनाए,
दिल कहता है दौर तो बस वो ही सही था,
जो भी है होना,वो अब हो ही जाए।

अब सुना है सांस भी लोग लेते हैं रुक रुक,
दहशत सी हर तरफ बेतहाशा है धुक धुक,
जो थे बेनकाब अब नकाबपोश हो गए हैं,
कुछ इस तरह होशवालों के होश खो गए हैं,
पास थे ही कहां जो कहते हैं दूरी बनाओ,
हाथ थामा ही कब जो कहते हैं हाथ ना मिलाओ,
हर गली अब है बंद कौन किवाड़ खटखटाए?
एक ही है अब मेहमान जो आए बिन बुलाए,
उस ड्योढ़ी उस चौखट को लगी किसकी हाय,
कमबख्त जो भी होना है..............!!!!


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