सिन्दूर – Delhi Poetry Slam

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सिन्दूर

By Ashu Bansal

सरहद पर जो निभाया,
वो तो उसका फ़र्ज़ हो गया है। 
न जाने क्यों लगता है जैसे,
हर जवान का मेरे सर पर क़र्ज़ हो गया है।  

इतिहास में दोहराई जाएँगी,
अब तो इनकी कहानियाँ। 
कोई ख्वाब नहीं था क्या इनका,
जो लुटा दी अपनी जवानियाँ। 

लौट कर तो न आएंगे,
मगर याद आएंगे ये हर पल। 
लुटाता है अपना आज,
कि सँवर जाये हमारा कल।  

देश की खातिर रहता है,
खुद अपनों से ही ये दूर। 
न्योछावर कर देता है अपना सब कुछ,
ताकि बच जाये सबका सिन्दूर।  


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