थमती परवाज़ – Delhi Poetry Slam

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थमती परवाज़

By Arushi Parasher

एक सुनहरी नहीं चिड़िया इस दुनिया में जब आई,
देख नियति की सुंदर कृतियां, अंतर मन में हर्षाई।
खूब प्यार स्नेह से सबने उसको बड़ा दुलारा,
वो भी लगाव से मिलती सबसे, मन था उसका प्यारा।

एक समय आया, उसको अपनी उड़ान खुद भरनी थी,
देख अनंत आकाश, वो अपने पंखों में दम भरती थी।
सारा नभ पर में भरने की उसकी तो जिज्ञासा थी,
इच्छा शक्ति इतनी की दुष्कर मुश्किल भी आसान थी।

सपने अपने सब सहेज कर, उड़ी अकेले एक दिन वो,
चार निगाहें उसे घूरतीं, डरती ना उन सब से वो।
एक शिकारी जालिम उसका रूप देखकर ललचाया,
तेज उड़ान वो थम जाए — ऐसा विचार मन में लाया।

तीक्ष्ण प्रहार से उसने पहले काटा उसके पंखों को,
गिरने लगी धरा पर, फिर भी कोशिश में थी उड़ने को।
सोच रही थी — कमी कहां थी? मैंने क्या कोई पाप किया?
नभ शायद यह मेरा ना था, पंखों ने मेरे नाप लिया।

सपने सारे बिखरे उसके, चित में एक चलचित्र चला,
कहां खो गया वो साहस, जो अब तक था मेरे साथ पला।
कुछ क्षण में ही उसने पूरे सफर को अपने देख लिया,
दी थी परवाज़ जिसने, अंतिम पल उनको याद किया।

गिरी धरा पर, आंखों से आंसू बन आशाएं बह निकलीं,
देह सुनहरी मिली माटी में, वो मोम की गुड़िया-सी पिघली।
वो मोम की गुड़िया-सी पिघली।।


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