By Aqdas Mujtaba
अचानक ख़याल आता है मुझे एक रात
आसमानों में से कौन है जो मुझे देखता है
ऐसी हसरत भरी आँखों से
ऐसी नरम मुस्कान लिए चेहरे पर
शायद वहम होगा मेरा
लोग पागल तो कहते ही हैं मुझे
कुछ भी सोचता रहता हूँ, देखता रहता हूँ
कुछ चीखें भी सुनाई देती हैं
उनसे बहुत डरता हूँ
वो चीखें मजमूआ बनाके एक रस्सी की शक्ल लेती हैं और लिपट जाती हैं मेरी गर्दन पर
मेरा गला घोंटती हैं कहती हैं
हम ग़लतियाँ हैं तेरे माज़ी की
इन चीखों से मेरे दिमाग़ की नसें फटती हैं
मैं कहाँ जाऊँ, किसको बताऊँ, किससे कहूँ
लोग पागल तो कहते ही हैं मुझे
अपने ही बालों में उंगलियाँ फंसा लेना पागलपन नहीं तो क्या है
एक नाम बड़बड़ाते रहना पागलपन नहीं तो क्या है
ख़ैर मुझे क्या, कहने दो पागल उन्हें
पागल तो वो हुए जो मुझे पागल समझते हैं
शायद वो अंधे हैं, शायद वो बहरे हैं
क्या इतने पाक दामन हैं कि कभी कुछ ग़लत किया ही नहीं
शायद बेदिल, बेमलाल हैं, पर क्यों?
क्या मैं अकेला हूँ, जिसे खुद से डर लगता है
डर लगता है मैं अपनी जान का कुछ न कर लूँ
डर लगता है कहीं अपनी साँसों पे बंध न लगा दूँ
डर लगता है
डर लगता है, कहीं अपने दिल को डाँट न दूँ कि धड़कना बंद कर दे
डर लगता है...