शायद – Delhi Poetry Slam

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शायद

By Apoorva Bhandari

उन मशरूफ़ सवेरों में,
उन अंधेरी रातों में,
उन अनकही बातों में,
उन सिमटे हुए जज़्बातों में,
क्यों आज भी छुपा है तू?

जब कर दिया वक़्त ने अलग,
जब हो गए दो दिल जुदा,
जब वादे सारे टूट गए,
जब शब्द भी बिखर गए,
तो क्यों आज भी यहीं है तू?

इस दिल को बहुत समझाया,
गणित का हर तर्क लगाया,
कभी बहलाया – कभी फुसलाया,
फिर भी इसने यादों में अपना घर क्यों बसाया?

जब इतना दर्द है,
तो नफ़रत क्यों नहीं?
जब इतना सन्नाटा है,
तो दिल में शोर क्यों?
जब मीलों की दूरी है,
तो सपनों में आना ज़रूरी क्यों?
जब मंज़िल अलग है,
तो उसी राह पर चलने की चाहत क्यों?
जब तूने ही ज़ख्म दिया है,
तो राहत भी तुझसे ही क्यों?
जब ग़लतियाँ हज़ार हैं,
तो आज भी माफ़ी की उम्मीद क्यों?

शायद इसलिए ताकि,
आदत और चाहत का फ़र्क़ समझ जाऊँ।
ताकि दिल को बेक़रार होने से पहले ही समझाऊँ,
कि इस बवंडर में तू क्यों खोता है?
इश्क़ आजकल नाप-तौल कर ही होता है।

शायद इसलिए ताकि,
जब ज़िन्दगी वापस इस मोड़ पर लेकर आए,
तो मुझे याद रहे—ज़रूरी नहीं कि अगर कोई आपके साथ चलने का वादा करे,
तो उस वादे को वो अंत तक निभाए।

शायद इसलिए ताकि,
दूसरों से पहले,
ख़ुद से हो जाए ऐसी बेशुमार मोहब्बत,
कि दिल वापस गिरने से पहले ही संभल जाए।


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