"संस्कृति का बोझ सिर्फ एक जेंडर पर क्यों?" – Delhi Poetry Slam

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"संस्कृति का बोझ सिर्फ एक जेंडर पर क्यों?"

By Ankita Yogi

वो औरतों से ट्रेडिशनल कपड़े रोज पहनने के लिए हिदायत देता नज़र आता है,
जो खुद ट्रेडिशनल कपड़े में साल में सिर्फ खास मौकों में ही नज़र आता है।

आज का पुरुष चाहता है कि औरतें रोज ट्रेडिशनल कपड़े पहनें,
और वही पुरुष रोज मॉडर्न कपड़े पहन कर बाहर जाता है।

वो चाहता है - औरत अगर कमा रही है, फिर भी वो घर के काम करे,
और पति क्या? वो तो बस ऑफिस से आए और आराम करे।
कहता है - "यही परंपरा है, हमारे यहाँ घर का काम औरत से ही कराया जाता है।"
और वो? वो तो आदमी है, और आदमी खाना थोड़ी बनाता है!
आदमी झाड़ू-पोछा थोड़ी लगाता है!

वो चाहता है कि औरतें सिंदूर, बिंदी, मंगलसूत्र, चूड़ी, पायल सब पहनें,
पर वो तो तिलक तक नहीं लगाता है।

उनको ट्रेडिशन के नाम पे सिर्फ औरतों को ज्ञान देना आता है,
क्योंकि खुद से तो इनसे ट्रेडिशन फॉलो नहीं किया जाता है।

पता नहीं हमारे समाज को क्यों ऐसा लगता है कि संस्कृति बचाने का ठेका सिर्फ औरतों ने ही ले रखा है,
खुद संस्कृति के नाम पे तो मर्द तिलक तक नहीं लगाता है।

यही है उस दोगले समाज का असली चेहरा,
जहाँ सिर्फ औरतों को ही ट्रेडिशन फॉलो करने के लिए कहा जाता है,
क्योंकि खुद से तो इनसे ट्रेडिशन फॉलो नहीं किया जाता है
क्योंकि खुद से तो इनसे ट्रेडिशन फॉलो नहीं किया जाता है।


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