मां – Delhi Poetry Slam

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मां

By Anjali Dhar

जाने कब लाड़ली बिटिया, पत्नी से मां बन गई
अपने बच्चों के जीवन की सूत्रधार बन गई।

उठते-बैठते एक रोग लगा गई,
बच्चों की मुस्कराहट को ही जीवन बना गई।

ना खुद की परवाह, ना खाने का होश,
मां के दिन-रात बच्चों के प्रेम से ओत-प्रोत।

झूठा गुस्सा, सच्चा प्यार —
यही माताओं का है स्वभाव।

तुम ध्यान भी ना दोगे,
फिर भी पीछे आएगी।

तुम इज्जत भी ना दोगे,
फिर भी तुम्हें सहलाएगी।

मां तो वो ढीठ है जो
मरते दम तक तुम पर ही प्यार लुटाएगी।

बार-बार कुढ़ेगी, घबराएगी,
हर नादानी माफ करती जाएगी।

मजाल है किसी की
जो तुम्हें खरोंच भी आ जाएगी।

मां ही जन्नत, मां ही पूजा,
मां के बिना तो जग है सूना।

ना मंदिर में, न मूरत में,
स्वर्ग बसा है मां-चरणों में।

मां की सेवा धर्म से ऊपर,
मां का प्रेम कर्म से ऊपर।

सब संकट को हरने वाली —
यही लक्ष्मी, सरस्वती और दुर्गा बलशाली।

सब वेदों से ऊपर होती —
निश्छल, निर्मल, प्रेममूर्ति।

ना मक्का, ना काबा में,
ना चार धाम की यात्रा में —

इन पर अपना शीश नवाओ,
मन मंदिर को स्वर्ग बना लो।

ये हीरा वापिस नहीं पाओगे,
बिखर गया तो ढूंढ नहीं पाओगे!


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