देखो ये कैसी घड़ी है आई – Delhi Poetry Slam

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देखो ये कैसी घड़ी है आई

By Akriti Sahai

देखो ये कैसी घड़ी है आई

सच्चे और अच्छे नहीं टिकते यहाँ,
धूर्त के हिस्से ही अब सारी शोहरत है आई।
ये ज़माना, अब ज़माना कहने लायक नहीं रहा,
मन दुखता है सोचकर ये।

ये मनहूस घड़ी कैसे बचपन की गलियों में
यौवन का तनाव ले आई।
जो ज़िंदगी की धार बहती थी उम्र की गंगा सी,
वहाँ मैले इरादों के कुंभ ने अफरा-तफरी है लाई।

न जाने किस सुबह की, न जाने किस भोर के होने की
खोटी उम्मीद मेरी बुझती सी आस है लाई।
मैं जानती हूँ कि सुबह की चादर ओढ़े हुए
ये भयंकर रात ही तो है आई।
इश्क़ की झूठी क़समों का नक़ाब पहनकर,
अवसाद सी काली गहरी बात ही तो है आई।
देखो ये कैसी घड़ी है आई।

तुम किस बंजर सी ज़मीन पर ख्वाबों के फूल हो ढूंढते?
देखो तुम्हें छुपाते, बचाते ये जंजाल से उगते पेड़ों की दशा,
ये दशा तुम्हारे सपनों की पतंग काटने के लिए तैयार ही तो है आई।

तुम कहते हो हम सब एक हैं,
मैं पूछती हूँ — अरे भोले, तुम अंधे हो या नादान?
आँखों से पट्टी खोलो — ये दुनिया की नफ़रतें देखो,
मज़हब और धर्म की ओढ़नी ओढ़े है आई।

कहाँ जाओगे बचकर, किस कमरे में छुपोगे मेरे यार?
ये घर की दीवारें बचाव में तुम्हारे,
आख़िर सपनों के पंखों को काटने ही तो है आई।

आवाज़ तुम्हारी दबती है जा रही,
जितना तुम चिल्लाते हो उतनी ये बहकती है जा रही।
एक मिनट इत्मीनान का मिल जाए बस अगर,
ऐसी इच्छा की आड़ में देखो रोज़मर्रा की ज़िंदगी मरती है आई।
देखो ये कैसी घड़ी है आई...

एक चमकता सा तारा, एक धुंधली आकाशवाणी,
न जाने इलाही से कैसी क़ुर्बतें है लाई —
शायद तुम्हारी रूह तुम्हें ये याद दिलाने है आई।
याद दिलाने की कोई किसी का नहीं होता,
सच और झूठ अब अच्छा नहीं होता।

होता है तो सिर्फ़ बंद कमरे सी घुटन,
बचता है तो बस एक बीमारी सा जलता हुआ ये जिया।
होता है तो अपनों का फ़ासलों से भरा सहारा,
क्योंकि हर कोई ख़ुद से इतना जुदा हो चुका।

ये हसरतें देखो मरती जा रही हैं,
ये ख़ुद को ढूंढने की खोज अब बढ़ती जा रही है।
एक आशा की किरण, एक आशा की किरण है कला में,
काव्य में, संगीत में, लिखावट में —
कि मिल जाए हम ख़ुद से,
बिकने से पहले इस मौत के बाज़ार में।

फिर एक हो हम सब कलाकार,
कल्कि की सेना बन करें हाहाकार,
कुछ रचें ऐसा जैसे गुमराह से मिलने एक नई राह है आई।
देखो ये कैसी घड़ी है आई,
देखो अब हम कलाकारों की घड़ी है आई।


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