कलंक – Delhi Poetry Slam

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कलंक

By Akhil Sharma

मैं काला, टुकड़े तोड़ भागूं क्यों
मुझे भी पसंद है चुगना।
कौव-कौव ही क्यों, जब कू-कू है सबके दिलों का सपना।

घड़े से काटे प्यास दोनों,
बस मेरे में कंकड़ क्यों?
वो हँसे तो मचले दिल,
मेरा रोना भी अपशगुन कहलाता है।
काटूं काले उजाले अकेले कैसे,
ईर्ष्या करूं ख़ुदा से, जो ऊपर जोडे बनाता है।

हर कदम खंगालता हूँ, अरे मैं बादलों में खुद को
सँवारता हूँ।
भोला हूँ पर मांस भी चबाता हूँ।
नज़र न लगे तुझको
मैं काली नज़र अपनों से भी चुराता हूँ।
दुख में दूसरों की परख नहीं मुझे,
मैं तो अपने छोड़, बचचे दूसरों के भी पालता हूँ।

फिर वो क्यों न बाँधें मेरे पंजों में उनके राज?
क्यों मेरे न दिखने का हो उन्हें नयाज़?
नकल पिंजरे में, मैं हूँ आवारगी में मलंग फिरना जानता
काला हूँ, है बस दोष इतना।

दोष काटुँ, है दोष मेरा,
उठ के छुपूं है कर्म तेरा।
तन पे, तन में का अलगाव है मेरी परेशानी।
रंग एक है, देख ख़ून की ज़ुबानी।
अलग वो सारी मुसीबत में,
हम एक हो जाते हैं।
दोस्त हमें अपनी ख़ुशी नहीं,
मौन पे बुलाते हैं।

मौत से करूं चुगली,
पत्थरों पे छोड़ के अपने निशान।
जन्म से करता हसरत,
झूठी बातों से सच्चे निकले वो निशान।
हर दिन कौव-कौव कर मैं फिर भी कोशिश करूं।
मान दूसरों को अपना।
मैं काला, टुकड़े तोड़ भागूं क्यों?
मुझे भी पसंद है चुगना।


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