सुनो दोस्त – Delhi Poetry Slam

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सुनो दोस्त

By ABHA VISHWAKARMA

 सुनो दोस्त !
 तुम आना अलसुबह भोर के उजास में
 जब सूरज अपनी गुनगुनी धूप लिए
 मेरे घर की चौखट को
 अपनी रौशनी से रंजित करेगा ।
 
 तुम्हारे स्वागत हेतु मैं खड़ी रहूंगी
 रंग- बिरंगे गुलाल की थाल सजाए
 दरवाज़े की ओट में
 और जब तुम कपाट खोल कर
 भीतर रखोगे कदम
 मैं झटपट उड़ेल दूंगी रंगों की थाल तुम्हारे ऊपर
 और खिलखिला कर हंस पडूंगी
 तुमको रंगों से नहाया देख कर ।
 
 दोस्त !
 मुझे मालूम है और विदित भी
 तुम शांत और गंभीर रहोगे इस प्रक्रिया के दौरान
 कुछ भी न कहोगे
 और अपने कंधे से लटकता झोले में हाथ डालकर
 मेरे हथेलियों पर रख दोगे
 कुछ पलाश और कचनार के फूल ।
 
 मैं उस क्षण का इंतजार करुंगी बेसब्री से
 क्योंकि, सिंदूरी पलाश की पंखुड़ियां
 मुझको कोमल और मृदु बनाएंगी
 तथा कचनार की खुशबू
 मुझको भिगो देगी बाहर से भीतर तक।
 
 तुम पलाश और कचनार बन कर आना
 जैसे तुम मिलते थे कई साल पहले
 क्योंकि, तुम्हारे बिना रंगों का यह त्यौहार
 बेमानी, फीका और बेरंग हो जाता है दोस्त !


1 comment

  • Thank you for appreciating my poem.

    Abha Vishwakarma

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