मोती – Delhi Poetry Slam

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मोती

By Amit Gupta

ढूंढें मोती रेगिस्तान में।
प्यास तो दूर
साँसे भी शायद ही रहें इस जान में॥

किसी कारवाँ के निशाँ तो हैं
होगा नहीं दूर,
पर हौसला अब नहीं क्या है इस गुमान में॥

एक कारवां मेरे साथ भी तो था,
उसके निशाँ भी नहीं
बदगुमानी थी साथ की, बूंदें क्यों है आँख में ॥

अब तो सूरज भी ढल रहा है,
रेगिस्तान भी सो रहा है,
लो मैं भी सो जाता हूँ, इस मिट्टी में ख़ाक में ॥


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