ये और वे बनने के पहले

By Abhay Yadav  

 

क्या हम उस वक़्त ये और वे नहीं थे?
खेलकर जब थक हारने के बाद
हम एक ही बोतल से पानी पीते
जब क्लास में कोई नयी खुराफ़ात
साथ में प्लान करते संग पिटते।

क्या तब तक ये और वे हम्में नहीं थे?

कभी काशिफ़ सर से पिल जाते
कभी चन्दन सर पेल देते
क्या अपनी गालियों में हम उनको
ये और वे बताते?

असेंबली ख़त्म होती
एक कतार में ऊपर चढ़ते
चढ़ते-चढ़ते मदर मैरी के दर्शन पड़ते
हल्के हाथ से चरण पढ़ते उनके, आगे बढ़ते

तब हम क्या थे?

जब कबड्डी होती
एक दुसरे की कमीज़ें फाड़ देते
फुटबॉल होता
धक्का-मुक्की होती
या फुटबॉल कहीं भी गोल बना के उड़ा देते

या कभी बेहद बेढंगे अंदाज़ में
आतिफ़ रग्बी के तर्ज़ पर
बॉल हाथ से उठाकर हो लेता फुर्र…
सारे बच्चे दोनों टीम के गोलकीपर सहित
उसकी दिशा में हो लेते मुड़

आतिफ़ दौड़ता बॉल लेके
बच्चे दौड़ते चीख मार के
उनमें से कुछ होते थुलथुले
जो थक हार कर रुक जाते
और टूटी सांस से चिल्लाते
“रुक… रुक जा…
रुकजा स्साले, बॉल लौटा दे!”

कुछ रहते जो तेज़ दौड़ते
और कौनसे खुद आतिफ़ भाई भी एथलिट थे
थक जाते गिरते पड़ते बॉल न छोड़ते

आतिफ़ गिरता बॉल लेके
बाकी गिरते छलांग लेके
और बॉल सरक जाती…
उस समय तक लेकिन एक दूसरा खेल बन जाता
लाशों से गिरे गट्ठर में लोटने का
एक के ऊपर एक
ये और वे गिरे जाते
फिर हाँफते हँसते और लौट जाते,
खेलने।

“बच्चे तो ये और वे नहीं होते…”
मैं नहीं मानता
किसी कार्तिक को सकीना पसंद आ जाती,
स्वाभाविक तौर पे

जैसे किसी तन्मय को तान्या

लेकिन कार्तिक केवल छुटपन में ही
समझ लेता कि उसके दिल की
धड़कन का यूँ अकस्मात् बढ़ जाना
एकटक उसे सकीना का
ढेरों लड़कियों के बीच अकेला दिख पाना
ठीक नहीं है।

या तो उसे खुद समझना है
या उसके आस-पड़ोस के बच्चे को
जिसे उसके चेहरे की रंगत
कुछ बदली बदली सी दिखी

"लेकिन तन्मय भी तो तान्या को"
"और शिवम् भी तो शिवानी को"
कार्तिक तार्किक होता है।

"हाँ सही है, स्वाभाविक भी"
लेकिन तुम और सकीना? भाई भूल जाओ
ठंडा पानी पियो ख़्वाबों को पिलाओ

तुम ‘ये’ हो और वो ‘वे’
और कुछ नहीं होना…!
स्वाभाविक है, सामाजिक भी।

पर बच्चे ये और वे नहीं होते
अभी तो होते हैं छोटे
बड़े बड़ों की हों सुनते
पर बड़े बड़ों सा बनते नहीं


हाथ जोड़ने जोड़ोगे
उर्दू बोलने बोलोगे

क्रिसमस में केक खा लिया
होली में रंगों नाहा लिया
ईद की छुट्टी मना ली
मिल लिए गले तीन बारी

बच्चे खेलते हर वह त्यौहार
जिसे खेल सकते।

फैंसी ड्रेस में पिद्दी सा अमान
फिरा पादरी बनेगा गॉड ब्लेस करता
कोई आयुष्मान अकबर बादशाह बनता
निकलती उर्दू फ़र्राटा
उसके तोतले मन से

कोई तो और हर बार की तरह
सर पे आटे- बेसन की गुम्बद बना
गोल चश्मा लेगा लगवा

और “ईश्वर अल्लाह तेरो नाम
सबको सन्मति दे-दे राम"
मिलेगी ताली।

फिर ये 15 अगस्त भी

छोटी छोटी उंगलियां
छोटी गोल खोपड़ी
सब पे तिरंगा तमगा

आज़ादी का जश्न मन जाता
आधा दिन बस फ़न में जाता

आधा दिन पूरा वो भी प्रोग्राम
कोई भी किस की मारो टपली
नहीं कोई रोकथाम
ये आज़ादी नहीं तो क्या?
खाली बस्ता, फुल मौज मस्ता

चाट पकोड़ी फ्री फण्ड की
ऊपर से फ्रूटी कम ठन्डी

चलो हो लिया अब घर जाओ
अपने अपने मोहल्ले पाओ
आज़ादी भी चंद घंटे ही
बनाएगी तुम्हें आज़ाद
फिर अपनी-अपनी रिक्शा में
तुम संगम या शहज़ाद।


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