याद है I – Delhi Poetry Slam

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याद है I

Harshada Kavale

याद है उस रेल की रफ्तार
और वो एक भूखी चीत्कार
जो उसके नीचे 
हमेशा के लिए मिट गई
और ये मेरी रूह और काया
न जाने कैसे पत्थर बन के
वहां से गुज़र गई
 
ये जो आवाजें घुम रही हैं
ये जो धड़कने चल रहीं हैं
कदम जो ना अब रुक रहे हैं
नई मंजिलें, जो पुकार रहीं हैं
कहीं, मिटा तो नहीं रहीं 
एक आवाज़ को
जो मुझे पूछ रही है,
 
 
मानते हैं तुम्हारी मंजिल
किसी की मोहताज नहीं
है इरादे तुम्हारे नेक
इसमें कोई शक नहीं
छू रहे हो चांद को अगर
चांदनी किसी पर बरसाते जा
है तुम्हारा जीवन सफल तो
किसी को जीवन पिलाएं जा
 
खेला है अगर इस मिट्टी में तुमने
उसे एक खेल ना बना
वो कर्ज ही क्या अदा किया तुमने
अगर एक अच्छा इंसान ना बना
 
यूं तो तितली को भी नहीं पता
कितने फूल खिल रहें
उसकी वजह से
और ना मधुमक्खी जानती है
के वह मधु निर्माण करती है
 
आज खड़े है यहां
कल कोई दूसरा होगा
जिंदगी का यह सफर चलता ही रहेगा
फिजाएं याद रखेगी
काम तेरा अगर था भला
और दुआएं जिंदा रहेंगी
झुर्रियों में,
किसी चेहरे पर

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