उड़ान – Delhi Poetry Slam

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उड़ान

Preksha Punmiya

अंडे से बाहर निकलकर सास लेना सिखा उसने
पंख फेलाकर उड़ना सिखा उसने
दुनिया के नियम से बेख़बर था वो
बड़े सपने देखना सिखा उसने
नहि जनता था ज़रूरत की परिभाषा
आँखों में थी तो बस आशा ही आशा
क्या पता था एक दिन उसका मालिक ही उसकी उड़ान सीमित कर देगा
इस्स दुनिया के दस्तूर के हिसाब से जीने पर मजबूर कर देगा।
यह तुम्हारा बचपन है जिसे तुमने रोक रखा है
उसी के ख़्वाब है जिनको तुमने अपने मन के संदूक में बंद रखा है
तुम ही हो जिसने उसे ज़मीन पर रहने की ज़रूरत बतायी
उसकी उड़ान पर रोक लगायी
सीमित किया उसका आसमान
चूर चूर किए उसके अरमान
जिन आँखों ने देखे थे सपने, सच्चे-झूठे कही सारे
आज उनके टूटने पर आँसू बहाते है ढेर सारे
उड़ने दो अरमानो को वरना
बेमयिने हो जाएँगे टूटते तारे।


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