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थे मेरे भी कुच्छ सपने

By Divya Maheshwari

 

थे मेरे भी कुच्छ सपने
थी मेरी भी कुच्छ ख्वाइशें

पर केसी किस्मत ने लगादी बंदिशें
बेचना पड़ा मुझे अपना बचपन
ताकी पल सके मेर पेट
और चल सेक मेरी साँसे

किसी का दिया दान
मेरे लिये तो कुबेर समान
क्या फर्क था मुझ मैं और उस में
जो मुझे ये झोपड़ी नसीब
हुई और उसे वह राजमहल

वो कहता है मुझे ये नही खाना
और मैं कहता हू बस मिल जाए कही से खाना
वो कहता हैं मुझे ये नही पहन ना
और मैं कहता हू बस तन ढ़क जाए मेरा
वो रो रहा है खुद को दुखी कह के
और में मुस्कुरा रहा हू उसके जिवन की कल्पना मात्र कर के।।

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This poem won in Instagram Weekly Contest held by @delhipoetryslam on the theme 'Street Kids'

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