Calling all poets. Submissins are open for Wingword Poetry Competition!

मेरी आंखें एक किल्कारी से खुली,

By Aarun Kashyap
किल्कारी फिर किसी के इस सड़क पर जन्म लेने की.
क्या इसको भी कोई उन्गली पकड़ कर चलना सिखायेगा, या इसको भी सड़क पर यों हि फेक दिया जायेगा?
माँ के दूध कि कमी मेह्सूस होगी इसे जब बारिश की बूँदे इसके होंठों को नसीब होंगी,
और एक बाप के साये से ज़्यादा इसे सर पर छत की कमी मेह्सूस होगी.
गाली, ठोकर और कभी दिलासा मिल जाता है मगर दो वक़्त का खाना नहीं मिलता,
देख अक्सर बच्चों को उनके माँ-बाप के साथ आंखें नम हो जाती हैं क्योंकि यहाँ तो ठीक से प्यार भी नहीं मिलता.
दिल करता है कि हमें भी कोई हाथ पकड़ कर स्कूल ले कर जाये और दो पल प्यार के साथ बिताये,
कचरे में अक्सर टूटे खिलौने, बचा हुआ खाना और चंद सिक्के मिल जाते हैं कभि-कभि मगर कम्बख्त ये किताबे क्यु नहीं मिलती?
हर बदलते मौसम के साथ एक घर कि दीवार कि तरह हर मौसम झेले हैं इस जिस्म ने और कुछ सपने मजबूती से आँखो में बस गये हैं,
इस सड़क ने बहुत कुछ दिखाया है और आकाश तक जाने का रास्ता भी दिखाया है.
वो जो चंद लोग आने लगे हैं अक्सर खाना, कपड़ा और थोड़ा प्यार ले कर जो बताते हैं कि सड़क के पार भी एक दुनिया है,
इस सड़क से उस दुनिया तक जाने का ये नन्ही आंखें अब बस देखती एक सपना हैं.
-------------------------------------------------------------------------------------------
This poem won in Instagram Weekly Contest held by @delhipoetryslam on the theme 'Street Kids'

1 comment

  • Amazing

    Tarun

Leave a comment