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ख्वाब

कान्हा शेखर

कोई भाव काश मेरे लिऐ भी जार्गत होता,
जो लिखा है मैने तेरे लिऐ, काश वैसा तूने भी लिखा होता,
पर तुम तो अपने आज घमंड में चूर हो,
कुछ धन और कुछ लोभ मे चूर हो,
में गीत अपनी पीडा का लिखता हूं,
जब समझो तुम इसको,
मैं तुम्हारे पक्ष से,
एक लेख अपेक्षित करता हूं,
समय अब बीत गया,
हम चोरी चोरी मिला करें,
रातों को छुपकर बात करें,
अब मिलन हो नही सकता है,
वैसे ही, जैसे समंदर आकर्षित को चांद के लिऐ,
पर उसका कभी नही हो सकता है,
मैने एक दौर गुज़ारा तेरे साथ,
तेरे साथ वो सर्द मौसम की धूप सेकी थी,
जब सर्व प्रथम था मिला तुमसे,
तेरी मेरी नज़रें आपस में खेली थी,
वो दिन नादानी के थे,
आज बडा तडपाते हैं,
जब भी निहारूं तुझे कविताओं में,
वो लेख दिल मेरा शांत कराते हैं,
पर तुम्हारी ख्वाबोअं मे आने की आदत खराब लगती है,
जो जागूं मैं, तेरे बिन ये दुनिया, बडी खराब लगती है।

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