इतना मत सता इसे


By Sushil Kumar
इतना मत सता इसे,
इसका वजूद मिट जाएगा,
जब खत्म हो जाएगा सब,
फिर अल्लाह अल्लाह चिलायेगा,
जरूरत तो अठन्नी की होती है,
छीन तू इससे सैंकड़ो लेता है,
कभी सोचना अकेले बैठकर,
मुफ्त में कौन तुझे इतना सब देता है,
जब माँ कहता है इतने प्यार से इसे,
तो थोड़ा सत्कार भी इसे दे दिया कर,
इतना मतलबी क्यूँ होगया तू इंसान,
कुछ इस दूसरी माँ के बारे में सोच लिया कर,
ये झरने, ये वादियाँ, ये पेड़, ये डालियाँ,
इन्होंने कितना कुछ है तुझे दिया,
कभी एक कौड़ी न माँगी बदले में,
बारी तेरी आयी तो तूने क्या दिया,
बचपन निकला जिसकी छाव में,
उस पेड़ को भी कभी सम्भाल लिया कर,
चलती रहेगी यूँ ही ज़िन्दगी की कश्मकश,
अपना कीमती वक़्त कभी इन्हें भी दिया कर,
दिल धड़कता है अगर तेरे सीने में,
तो कुछ प्यार इस मुँहबोली माँ के लिए भी रखना,
आसान तो बहुत है धरती माँ कहना,
पर असली इम्तिहान तो है इसका ख्याल रखना,
है ज़िंदा ये जबतक यूँ हँसती खेलती,
कुछ वक्त तूँ इसके साथ बिता लेना,
खुद तो शुरुआत कर कुछ नया करने की,
इस परायी दुनिया से भला तुझे क्या लेना।।
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This poem won in Instagram Weekly Contest held by @delhipoetryslam on the theme 'Mother Gaia' 

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