तुम्हारी उड़ान – Delhi Poetry Slam

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तुम्हारी उड़ान

By Gaurav Bhatnagar

क्यूँ टोकता हूँ तुम्हें

ख़ुद मन की करूँक्यूँ रोकता हूँ तुम्हें

छोटी सी ही बात पर क्यूँ दबाता हूँ तुम्हें 

 

प्यार करता हूँ तो जवाब क्यूँ माँगता हूँ

और फिर नज़रें क्यूँ नहीं मिला पाता हूँ 

 

सुनोगी मेरी हमेशा ऐसा तो नहीं सोचता

करोगी मेरी कही ये भी नहीं जँचता

फिर क्यूँ ऐसा इंसान बन जाता हूँ मैं

तुमसे पहचाना भी नहीं जाता हूँ मैं

 

सपने तुम्हारे भी हैं ये क्यूँ भूल जाता हूँ 

आशाएँ तुम्हारी मुझसे भी हैं 

वो वादे क्यूँ नहीं निभाता हूँ 

 

परवरिश है ये या सदियों की सीख़की रखूँ तुम्हें थोड़ा सा खींच 

परवरिश है ये या सदियों की सीख़की रखूँ तुम्हें थोड़ा सा खींच 

माँ को भी देखा था पिसते इस पाटे के बीच 

अहल्याशकुंतलासीता में भी शायद बोए गए थे इस सोच के बीज 

 

संगिनीजीवन तरिंगनि हो तुम ये समझता हूँ 

मेरे अरमान तुमसेतुम्हारे ख़्वाब मुझसे ये अहसास भी रखताहूँ 

तोड़ रहा हूँ सदियों के भ्रम...तुम्हें दबाने का ये क्रम 

 

प्यार तुमसे करता हूँतुम्हें भी उड़ते देखना चाहता हूँ 

करी है नयी शुरुआतफिर साथ तुम्हारा चाहता हूँ 

अब तुम्हारे साथ उड़ना चाहता हूँ 


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