Submissions open for Beetle Magazine's November Issue

यू तो पहले अनजान थे हम,

यू तो पहले अनजान थे हम,
अनजानी राहों पर मिले थे हम|
न तो हमारी बात हुई,
अौर न ही आँखे चार हूई|
फिर भी उस दिन एक अलग-सा अहसास हुआ,
न जाने क्यू तू मेरे लिए खास हुआ|
अब तो बस ...
उसी अहसास के साथ उठती हूँ मैं,
अौर रात में उसी अहसास की चादर बना कर सोती हूँ मैं|
पता नहीं क्या खास हैं तेरे अहसास में,
कि न चाहते हुए भी अब बदलने लगी हूँ मैं|
कभी तेरा अहसास मेरे चेहरे पर नूर बनकर उभरता हैं,
तो कभी गालो की लाली बनकर चमकता हैं|
.
.
.
.
.
जानती हूँ अभी भी अनजान है हम,
अनजानी राहों पर दो बिछड़े हुए मेहमान है हम|
लेकिन अब खुदा का शुक्रिया करती है मैं,
कि अच्छा हुआ अनजान है हम|
पहले जो तेरा अहसास खास लगता था,
अब उसी से नफरत होने लगी है|
अब तो ऐसा लगता है...
कि मेरी जिंदगी मुझपे हँसने लगी है|
लेकिन...
अच्छा हुआ कि तू अनजान सही है,
मेरा अच्छा नसीब कि मेरे साथ नहीं है|
लेकिन जो तेरा अहसास मेरे लिए खास था,
वो वाकई  मेरी जिंदगी के लिए खास था|
अब तो बस यही दुआ करती हूँ मैं,
कि अगर फिर से तुझसे किसी अनजान राह पर मिलती हूँ मैं|
तो बस हँसकर तेरा अौर तेरे उस अहसास का शुक्रिया करती हूँ मैं,
जिसने मुझे आज वहाँ पहुँच या,
जहाँ खुद को कभी भी न सोचती थी मैं|
-------------------------------------------------------------------------------------------
This poem won in Instagram Weekly Contest held by @delhipoetryslam on the theme 'An Experience That Changed My Life'

3 comments

  • Thank you keerat for ur sweet comment. 😊

    Pooja
  • Really like ur poem💕 well expressed, and i like the most the line where u are thanking the person who left..🌸☺️

    Keerat
  • thankyou delhipoetryslam for selecting my poem for ur E-Magazine.Thankyou so much.🙏🏻🙏🏻🙏🏻

    Pooja Kumari

Leave a comment