भारत- मेरी पहचान

हर सांस में बसता मेरा देश, 
हर जन का दिखता अपना वेश, 
किसी के ह्रदय में ना कोई द्वेष 
यही है मेरा भारत देश ।
सभ्य सभ्यता अनूठी पहचान, 
हर व्यक्ति यहाँ दिखे समान,
एक दूजे को सब देते सम्मान, 
तभी कहें सब भारत को महान ।
बच्चे देते बड़ो को आदर,
हर मजार पर चढे है चादर,
मंदिर मस्जिद सभी हैं जाते, 
चर्च गुरूद्वारे भी सभी को भाते।
हर मानव को यहाँ एक ही धर्म, 
हर क्षण स्मरण करें वे कर्म, 
वायु, जल और शुद्ध वातावरण, 
यहाँ प्रतीत अद्भुत वातावरण ।
फलों सब्जियों का यहाँ भण्डार, 
हर पत्थर में दिखे आकार,
स्वास्थ्य सेवा और विभिन्न औषधि,
हर क्षेत्र में भारत की प्रसिद्धि ।
यहाँ का मानव कभी ना थकता,
सभी परिस्थितियों में भी चलता,
कभी ना दिखते ये सब दुखी, 
विपत्तियों में भी रहे सुखी।
भोजन में दिखे विविधता, 
वाणी में दिखे शुद्धता, 
मानवता यहाँ की प्रथम विशेषता, 
हर जन ह्रदय भारत है बसता ।
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This poem won in Instagram Weekly Contest held by @delhipoetryslam on the theme 'Indianess'

3 comments

  • Awesome poem. Loved it.

    Tapas mukharjee
  • Wonderful poem. I have read his poems earlier also. Nice writings.

    Suresh Bal
  • Very nice poem. While reading it I feel like I am travelling all over India. The poet amazingly tuned the poem in such a way that every Indian can feel its essence.

    Lavanya jetli

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