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आचार कैरी का!

By Shruti Gupta

 

(1)जिह्ववा भी अब कहा रुके आम की आशय से। ,

आचार कौन सा डालू बोजामे से?
2)आम लहसुन या खटाई लाऊँ ईमली रानी की,
बगल में हरी मिरच कह रही मुंह दिखाई करो हमारी भी... 
3)भ ई क्या बात कही खुश  मिजाजी की ,
आज तो बात हुई "दिल को दिल से मिलाने की "...
4)"चूहो की दौड़ आ रही मेरी अमाश से ,
जिह्वा भी अब कहा रुके आम की फरमाईश से ...
5)पापङ भी लगा देना प्लेट की नुमाइश में... 
अरे! वो कैरी भी क्या लगती,थीखलियाने की हरियाली में... 
6)अब तो घर से दूर विदेशी  ब़ैड रही खाने  में, 
आज भी मेरा गाँव याद आ जाता है आचार के बहाने से! 
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This poem won in Instagram Weekly Contest held by @delhipoetryslam on the theme 'Indianess'

2 comments

  • Thanks @Vrinda….

    Shruti Gupta
  • You have expressed about the ‘kairi ka achaar’ just in the way every Indian loves it. Each and every word is written very beautifully.

    Vrinda

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